Insurance vs Hospital. बीमा बनाम अस्पताल: क्यों मरीज बीच में फँस जाते हैं
- Khushi Berry
- Dec 12, 2025
- 2 min read
जब कोई मेडिकल इमरजेंसी हो या कोई प्लान्ड इलाज चल रहा हो, तो मरीज उम्मीद करते हैं कि अस्पताल और बीमा कंपनी के बीच सब कुछ आसानी से हो जाएगा। लेकिन अक्सर उन्हें कागज़ी कारवाई, अप्रूवल में देरी और अचानक आने वाले बिलों के जाल में फँसना पड़ता है।
मान लीजिए ऐसा आपके साथ होता है: आपके परिवार की किसी महिला को घुटने बदलने की सर्जरी की जरूरत है और आप उन्हें मुंबई के एक अस्पताल में ले जाते हैं। अस्पताल बीमा कंपनी से प्री-ऑथराइज़ेशन मांगता है, लेकिन मंज़ूरी पाँच दिन तक नहीं आती। इस बीच कमरे का किराया बढ़ जाता है, कुछ दवाइयाँ कवर नहीं होतीं, और आखिर में आपको ₹30,000 अपनी जेब से देने पड़ते हैं। बाद में पता चलता है कि आपकी पॉलिसी में रूम रेंट की सीमा थी और कुछ इम्प्लांट कवर में नहीं थे—ऐसी बातें जो आपको सबसे ज़्यादा जरूरत के समय पता होनी चाहिए थीं। पॉलिसी की बेहतर समझ और अस्पताल से पहले बातचीत करने पर यह झटका टाल सकते थे।
यह परेशानी भारत की हेल्थकेयर व्यवस्था में आम है, खासकर उन लोगों के लिए जो इलाज के लिए बीमा पर निर्भर करते हैं।

मरीजों को बीमा और अस्पताल के बीच दिक्कतें क्यों आती हैं
बीमा कंपनियों और अस्पतालों की प्राथमिकताएँ अलग होती हैं—अस्पताल इलाज और अपने खर्चों पर ध्यान देते हैं, जबकि बीमा कंपनियाँ क्लेम को कम रखने का प्रयास करती हैं। बीच में फँस जाते हैं—मरीज।
प्री–ऑथराइज़ेशन और देरी
कई बीमा प्लान में इलाज शुरू होने से पहले प्री-ऑथराइज़ेशन जरूरी होता है। मंज़ूरी में कई बार दिनों की देरी हो जाती है। इससे जरूरी सर्जरी भी टल सकती है।
कन्फ्यूज़िंग कवरेज टर्म्स
बीमा पॉलिसियों की भाषा अक्सर जटिल होती है। मरीज सोचते हैं कि सब कवर है, लेकिन बाद में पता चलता है कि कुछ चीज़ें आंशिक या बिल्कुल कवर नहीं हैं—जैसे रूम रेंट लिमिट या कुछ खास दवाइयाँ।
बिलिंग विवाद और अचानक आने वाले खर्चे
अस्पताल विस्तृत बिल देते हैं, और बीमा कंपनियाँ उनमें से कई आइटम रिजेक्ट कर देती हैं। फिर उस अंतर की राशि मरीज से वसूली जाती है।
मरीज क्या कर सकते हैं
पॉलिसी को ध्यान से पढ़ें
अस्पताल के बिलिंग विभाग से पहले ही बातचीत करें
सारे दस्तावेज़ संभालकर रखें
कैशलेस सुविधा का उपयोग करें
टेक्नोलॉजी की भूमिका
आज कई बीमा कंपनियाँ ऐप और ट्रैकिंग सिस्टम दे रही हैं जिससे प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होती जा रही है। अगर अस्पताल और बीमा कंपनियाँ और सरल प्रक्रियाएँ अपनाएँ, तो मरीजों का अनुभव काफी बेहतर हो सकता है। इसके अलावा, डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड और ऑनलाइन डॉक्यूमेंट अपलोड जैसी सुविधाएँ कागज़ी झंझट कम करके मरीजों और उनके परिवारों का समय बचाती हैं। आने वाले समय में एआई आधारित प्रणालियाँ मंज़ूरी प्रक्रिया को और भी तेज़ बनाकर उपचार का इंतज़ार लगभग खत्म कर सकती हैं।






Comments